Shiv Raksha Stotra PDF | शिव रक्षा स्त्रोत भगवान शिव के शक्तिशाली स्त्रोतों में से एक है जिनके रचयिता ऋषि याज्ञवल्क्य है और भगवान नारायण ने स्वयं इनके सपनें में शिव रक्षा कवच स्त्रोत का वर्णन किया था. धार्मिक मान्यता है कि शिव रक्षा स्त्रोत एक ऐसा कवच स्त्रोत हैं जिनको नियमित रूप से पाठ करने वाले भक्तों को भगवान शिव सदैव सुरक्षित रखने के साथ सभी प्रकार के संकटों, रोगों, दुर्घटनाओं और बुरी शक्तियों से भी रक्षा करते हैं. भगवान शिव मृत्युंजय कहलाते हैं अर्थात जिसने मृत्यु पर विजय प्राप्त किया हो इसलिए भक्तों को अपने परिवार के सभी तरह के दुःख, दरिद्रा, रोगों और अकाल मृत्यु से रक्षा के लिए नियमित रूप से या फिर केवल सोमवार को शिव रक्षा स्त्रोत का पाठ करना चाहिए.
Shiv Raksha Stotra | शिव रक्षा स्त्रोत हिंदी में
|| शिव रक्षा स्त्रोत हिंदी अनुवाद ||
विनियोग : ॐ इस शिव रक्षा स्त्रोत मंत्र के ऋषि याज्ञवल्क्य है, देवता श्रीसदाशिव है और छ्न्द अनुष्टुप है, श्री सदाशिव की प्रसन्नता के लिए शिव रक्षा स्त्रोत के जप में इनका विनियोग किया जाता हैं.
|| देवाधिदेव महादेव का यह परम् पवित्र चरित्र चतुर्वर्ग अर्थात् धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाला है, यह अत्यंत उदार है तथा इनकी उदारता का कोई पार नहीं है || 1 ||
|| साधक को गौरी और विनायक से युक्त अर्थात साथ है, जो त्रिनेत्रधारी तथा पांच मुख वाले हैं, उन दस भुजाधारी भगवान शिव का ध्यान करके शिव रक्षा स्त्रोत का पाठ करना चाहिए || 2 ||
|| गंगा को अपने जटाओं में धारण करने वाले गंगाधर शिव मेरे मस्तक की, अर्धचन्द्र को धारण करने वाले अर्थेन्दुशेखर मेरे ललाट की, मदन अर्थात कामदेव का ध्वंस करने वाले मदनदहन मेरे दोनों नेत्रों की तथा सर्प को आभूषण के रूप में धारण करने वाले सर्पविभूषण शिव मेरे दोनों कानों की रक्षा करें || 3 ||
|| त्रिपुरासुर का संहार करने वाले पुराराति मेरे नाक की, संपूर्ण जगत की रक्षा करने वाले जगत्पति मेरे मुख की, वाणी के स्वामी वागीश्वर मेरी जिह्वा की तथा नीलकंठ मेरी गर्दन की रक्षा करें || 4 ||
|| जिनके कंठ में श्री अर्थात सरस्वती निवास करती हैं, ऐसे श्रीकण्ठ मेरे कंठ की, विश्व की धुरी को धारण करने वाले विश्वधुरंधर शिव मेरे दोनों कन्धों की, पृथ्वी के भारस्वरूप दैत्यादि का संहार करने वाले भूभारसंहर्ता शिव मेरे दोनों भुजाओं की, धनुष धारण करने वाले पिनाक धारक मेरे दोनों हाथों की रक्षा करें || 5 ||
|| भगवान शंकर मेरे हृदय की और गिरिजापति मेरे जठरदेश अर्थात पेट की रक्षा करें. भगवान मृत्युंजय मेरी नाभि की रक्षा करें तथा व्याघ्रचर्म को वस्त्ररूप में धारण करने वाले भगवान शिव मेरे कमर की रक्षा करें || 6 ||
|| दीन, दुखियों और शरणागतों से प्रेम करने वाले मेरी हड्डियों की रक्षा करें, महेश्वर मेरी जांघों की रक्षा करें तथा जगदीश्वर मेरे घुटनों की रक्षा करें || 7 ||
|| जगत के रचयिता जंघाओं की रक्षा करें, गणों के अधिपति मेरे टखनों की रक्षा करें,करुणा के सागर मेरे पैरों की रक्षा करें और सदाशिव मेरे सभी अंगों की रक्षा करें || 8 ||
|| जो सुकृति (धन्य) व्यक्ति शिवकी शक्ति से युक्त इस रक्षा का पाठ करता हैं, वह सभी कामों को भोग कर अंत में शिव से मिल जाता हैं || 9 ||
|| तीनों लोकों में जितने भी ग्रह, भूत, पिशाच आदि विचरते है, वे सब शिव के नामों से मिली रक्षा से तत्काल दूर भाग जाते हैं || 10 ||
|| जो भी पार्वतीपति शिव के इस कवच को अपने कण्ठ में भक्ति के साथ धारण कर लेता है, तीनों लोक उनके वश में हो जाते हैं || 11 ||
| इति श्री शिव रक्षास्तोत्रं सम्पूर्ण |
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