Kanakadhara Stotram | कनकधारा स्तोत्र आदि शंकराचार्य द्वारा रचित मां लक्ष्मी की स्तुति में रचा गया बहुत ही पवित्र, शुभ और प्रभावशाली स्त्रोत्र हैं जिसको पढ़ने से धन, सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती हैं. धार्मिक मान्यता है कि जिस पर मां लक्ष्मी की कृपा होती हैं उसके जीवन में सुख – समृद्धि का वास होने के साथ ही उसके जीवन में कभी भी धन की कमी नहीं होती हैं तो वहीं अगर रोजाना कनकधारा स्तोत्र का पाठ किया जाए तो उसे मां लक्ष्मी की प्रसन्नता मिलने के साथ ही धन – संपत्ति में वृद्धि भी होती रहती हैं. कनकधारा स्तोत्र में 18 श्लोक सरल हिंदी में अर्थ सहित दिया गया है जिसको सरलता से पाठ किया जा सकता हैं.
कनकधारा स्तोत्र हिंदी अनुवाद :
| जैसे भ्रमरी अधखिले कुसुमों से अलंकृत तमाल – तरु का आश्रय लेती है, उसी प्रकार जो प्रकाश श्रीहरि के रोमांच से सुशोभित श्रीअंगों पर निरंतर पड़ता रहता हैं तथा जिसमें संपूर्ण ऐश्वर्य का निवास है, संपूर्ण मंगलों की अधिष्ठात्री देवी भगवती महालक्ष्मी का वह कटाक्ष मेरे लिए मंगलदायी हो ||1||
| जैसे भ्रमरी महान कमल दल पर मंडराती रहती हैं, उसी प्रकार जो श्रीहरि के मुखारविंद की ओर बराबर प्रेमपूर्वक जाती हैं और लज्जा के कारण लौट आती हैं. समुद्र कन्या लक्ष्मी की वह मनोहर मुग्ध दृष्टिमाला मुझे धन संपत्ति प्रदान करें ||2||
| जो संपूर्ण देवताओं के अधिपति इंद्र के पद का वैभव – विलास देने में समर्थ है, मधुहन्ता श्रीहरि को भी अधिकाधिक आनंद प्रदान करने वाली है तथा जो नीलकमल के भीतरी भाग के समान मनोहर जान पड़ती हैं, उन लक्ष्मीजी के अधखुले नेत्रों की दृष्टि क्षण भर के लिए मुझ पर थोड़ी सी अवश्य पड़ें ||3||
| शेषशायी भगवान विष्णु की धर्मपत्नी श्री लक्ष्मीजी के नेत्र हमें ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हो, जिनकी पुतली तथा बरौनियां अनंग के वशीभूत हो अधखुले, किंतु साथ ही निर्निमेष (अपलक) नयनों से देखना वाले आनंदकंद श्री मुकुन्द को अपने निकट पाकर कुछ तिरछी हो जाती हैं ||4||
| जो भगवान मधुसूदन के कौस्तुभमणि – मंडित वक्षस्थल में इंद्रनीलमयी हरावली – सी सुशोभित होती हैं तथा उनके भी मन में प्रेम का संचार करने वाली है, वह कमल – कुंजवासिनी कमला की कटाक्षमाला मेरा कल्याण करें ||5||
| जैसे मेघों की घटा में बिजली चमकती है, उसी प्रकार जो कैटभशत्रु श्रीविष्णु के काली मेघमाला के श्यामसुंदर वक्षस्थल पर प्रकाशित होती हैं, जिन्होंने अपने आविर्भाव से भृगुवंश को आनंदित किया है तथा जो समस्त लोकों की जननी है, उन भगवती लक्ष्मी की पूजनीय मूर्ति मुझे कल्याण प्रदान करें ||6||
| समुद्र कन्या कमला की वह मंद, अलस, मंथर और अधो अधोर्णमिलित दृष्टि, जिसके प्रभाव से कामदेव ने मंगलमय भगवान मधुसूदन के हृदय में प्रथम बार स्थान प्राप्त किया था, यहां मुझ पर पड़े ||7||
| भगवान नारायण की प्रेयसी लक्ष्मी का नेत्र रूपी मेघ दयारूपी अनुकूल पवन से प्रेरित हो दुष्कर्म (धनागम विरोधी अशुभ प्रारब्ध) रूपी धाम को चिरकाल के लिए दूर हटाकर विषाद रूपी धर्मजन्य ताप से पीड़ित मुझ दीन रूपी चातक पर धनरुपी जलधारा की वृष्टि करें ||8||
| विशिष्ट बुद्धि वाले मनुष्य जिनके प्रीति पात्र होकर जिस दया दृष्टि के प्रभाव से स्वर्ग पद को सहज ही प्राप्त कर लेते हैं, पद्मासना पदमा की वह विकसित कमल – गर्भ के समान कांतिमयी दृष्टि मुझे मनोवांछित पुष्टि प्रदान करें ||9||
| जो सृष्टि लीला के समय वाग्देवता (ब्रह्मशक्ति) के रूप में विराजमान होती हैं तथा प्रलय लीला के काल में शाकम्भरी (भगवती दुर्गा) अथवा चन्द्रशेखर वल्लभा पार्वती (रूद्रशक्ति) के रूप में अवस्थित होती हैं, त्रिभुवन के एकमात्र पिता भगवान नारायण की उन नित्य यौवना प्रेयसी श्रीलक्ष्मीजी को नमस्कार है ||10||
| मात: ! शुभ कर्मों का फल देने वाली श्रुति के रूप में आपको प्रणाम है।. रमणीय गुणों की सिंधु रूपारति के रूप में आपको नमस्कार है।. कमल वन में निवास करने वाली शक्ति स्वरूपा लक्ष्मी को नमस्कार है तथा पुष्टि रूपा पुरुषोत्तम प्रिया को नमस्कार है ||11||
| कमल वदना कमला को नमस्कार है. क्षीरसिंधु सभ्यता श्रीदेवी को नमस्कार है.चंद्रमा और सुधा की सगी बहन को नमस्कार है. भगवान नारायण की वल्लभा को नमस्कार है ||12||
| कमल सदृश नेत्रों वाली माननीय मां ! आपके चरणों में किए गए प्रणाम संपत्ति प्रदान करने वाले, संपूर्ण इंद्रियों को आनंद देने वाले, साम्राज्य देने में समर्थ और सारे पापों को हर लेने के लिए सर्वथा उद्यत है, वे सदा मुझे ही अवलम्बन दें. (मुझे ही आपकी चरण वंदना का शुभ अवसर सदा प्राप्त होता रहे) ||13||
| जिनके कृपा कटाक्ष के लिए की गई उपासना उपासक के लिए संपूर्ण मनोरथों और संपत्तियों का विस्तार करती हैं, श्रीहरि की हृदयेश्वरी उन्हीं आप लक्ष्मी देवी का मै मन, वाणी और शरीर से भजन करता हूं ||14||
| भगवती हरिप्रिया ! तुम कमल वन में निवास करने वाली हो, तुम्हारे हाथों में नीला कमल सुशोभित है. तुम अत्यंत उज्ज्वल वस्त्र, गंध और माला आदि से सुशोभित हो. तुम्हारी झांकी बड़ी मनोरम है. त्रिभुवन का ऐश्वर्य प्रदान करने वाली देवी, मुझ पर प्रसन्न हो जाओ ||15||
| दिग्गजों द्वारा सुवर्ण – कलश के मुख से गिराए गए आकाश गंगा के निर्मल एवं मनोहर जल से जिनके श्री अंगों का अभिषेक (स्नान) संपादित होता हैं, संपूर्ण लोकों के अधिश्वर भगवान विष्णु की गृहिणी और क्षीरसागर की पुत्री उन जगज्जननी लक्ष्मी को मैं प्रात: काल प्रणाम करता हूं ||16||
| कमल नयन केशव की कमनीय कामिनी कमले ! मैं आकिंचन (दीन-हीन) मनुष्यों में अग्रगण्य हूँ, अतः तुम्हारी कृपा का स्वाभाविक पात्र हूँ। तुम उमड़ती हुई करुणा की बाढ़ की तरफ तरंगों के समान कटाक्षों द्वारा मेरी ओर देखों ||17||
| जो मनुष्य इन स्तुतियों द्वारा प्रतिदिन वेदत्रयी स्वरूपा त्रिभुवन – जननी भगवती लक्ष्मी की स्तुति करते हैं, वे इस भूतल पर महान गुणवान और अत्यंत सौभाग्यशाली होते हैं तथा विद्वान पुरुष भी उनके मनोभावों को जानने के लिए उत्सुक रहते हैं ||18||
|| कनकधारा स्तोत्र समाप्त ||
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