Ganpati Atharvashirsha PDF | भगवान गणेश की पूजा-आराधना बहुत ही फलदायक और मंगलकारी माना जाता है तो वहीं भगवान गणेश का आशीर्वाद और कृपा प्राप्त करने के लिए शास्त्रों में अनेकों श्लोक, स्तोत्र, मंत्र जाप और प्रार्थनाओं का उल्लेख किया गया हैं जिनमें से एक पाठ “गणेश अर्थवशीर्ष” है और यह भगवान श्रीगणेश को समर्पित ऐसा स्तोत्र है जो कि बहुत मंगलकारी होने के साथ ही इससे शीघ्र ही मनोवांछित फल की प्राप्ति होती हैं.
गणेश अर्थवशीर्ष का पाठ रोजाना करने से परिणाम बहुत जल्दी मिलते हैं, परंतु अगर आप रोजाना पाठ नहीं कर सकते तो तो इसे बुधवार के दिन अवश्य पढ़ें. आइए पढ़ते हैं गणेश अर्थवशीर्ष पाठ हिंदी में और आप इसे PDF के रूप में डाउनलोड (Free PDF Download) भी कर सकते हैं और अपने मोबाइल या लैपटॉप में रख सकते हैं और नियमित तौर पर इसे पढ़ सकते हैं लिंक नीचे दिया हुआ है वहां से आप उसे जरूर डाउनलोड कर ले.
Ganpati Atharvashirsha PDF In Hindi – गणेश अर्थवशीर्ष पाठ
|| श्री गणेश अर्थवशीर्ष ||
| भगवान गणपति को मेरा नमस्कार है. हे गणेश ! तुम्ही प्रत्यक्ष तत्व हो. तुम्हीं केवल कर्ता हो. तुम्ही केवल धर्ता हो. तुम्हीं केवल हर्ता हो. निश्चयपूर्वक तुम्हीं इन सब रूपों में विराजमान ब्रह्म हो. तुम साक्षात नित्य आत्मस्वरूप हो ||1||
| मैं ऋत न्याययुक्त बात करता हूं, सत्य कहता हूं ||2||
| हे पार्वतीनंदन ! तुम मेरी रक्षा करो. वक्ता की रक्षा करो. श्रोता की रक्षा करो. दाता की रक्षा करो. धाता की रक्षा करो. व्याख्या करने वाले आचार्य की रक्षा करो. शिष्य की रक्षा करो. पश्चिम से रक्षा करो. पूर्व से रक्षा करो. उत्तर से रक्षा करो. दक्षिण से रक्षा करो. ऊपर से रक्षा करो. नीचे से रक्षा करो. सब ओर से मेरी रक्षा करो. चारों ओर से मेरी रक्षा करो ||3||
| तुम वाङ्मय हो, चिन्मय हो. तुम आनंदमय हो. तुम ब्रह्ममय हो. तुम सच्चिदानंद अद्वितीय हो. तुम प्रत्यक्ष ब्रह्म हो. तुम दानमय विज्ञानमय हो ||4||
| यह जगत तुमसे उत्पन्न होता हैं. यह सारा जगत तुममें ही सुरक्षित रहता है. ये सारा जगत तुम में ही विलय को प्राप्त होगा. इन सारे जगत की तुममें प्रतीति हो रही है. तुम भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश हो. परा, पश्चती, बैंखरी और मध्यमा वाणी के ये विभाग तुम्ही हो ||5||
| तुम सत्व, रज और तीनों गुणों से परे हो. तुम जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं से परे हो. तुम स्थूल, सूक्ष्म और वर्तमान तीनों देहों से परे हो. तुम भूत, भविष्य, और वर्तमान तीनों कालों से परे हो. तुम मूलाधार चक्र में नित्य स्थित रहते हो. इच्छा, क्रिया और ज्ञान तीन प्रकार की शक्तियां तुम्हीं हो. तुम्हारा योगिजन नित्य ध्यान रखते हैं. तुम ब्रह्मा हो, तुम विष्णु हो, तुम रुद्र हो, तुम इन्द्र हो, तुम अग्नि हो, तुम वायु हो, तुम सूर्य हो, तुम चंद्रमा हो, तुम ब्रह्म हो, भू:, र्भुव:, स्व: ये तीनों लोक तथा ॐकार वाच्य पर ब्रह्म भी तुम हो ||6||
| गण के आदि अर्थात “गं” कर पहले उच्चारण करें. उसके बाद वर्णों के आदि अर्थात “अ” उच्चारण करे. उसके बाद अनुस्वार उच्चारित होता हैं. इस प्रकार अर्धचंद्र से सुशोभित “गं” ॐकार से अवरूद्ध होने पर तुम्हारे बीज मंत्र का स्वरूप (ॐ गं) है. गकार इसका पूर्वरूप है. बिंदु उत्तर रूप हैं. नाद संधान है. संहिता संविध हैं. ऐसी यह गणेश विद्या है. इस महामंत्र के गणक ऋषि है. निचगदाय छंद है श्री मद्महागणपति देवता है. वह महामंत्र है – ॐ गं गणपतये नमः ||7||
| एक दंत को हम जानते है. वक्रतुंड का हम ध्यान करते हैं. वह दन्ती (गजानन) हमें प्रेरणा प्रदान करें. यह गणेश गायत्री है ||8||
| एकदंत चतुर्भुज चारों हाथों में पाक्ष, अंकुश, अभय और वरदान की मुद्रा धारण किए तथा मूषक चिह्न की ध्वजा लिए हुए, रक्तवर्ण लंबोदर वाले सूप जैसे बड़े – बड़े कानों वाले रक्त वस्त्रधारी शरीर पर रक्त चंदन का लेप किए हुए रक्तपुष्पों से भलिभाँति पूजित. भक्त पर अनुकम्पा करने वाले देवता, जगत के कारण अच्युत, सृष्टि के आदि में आविर्भूत प्रकृति और पुरुष से परे श्रीगणेशजी का जो नित्य ध्यान करता हैं, वह योगी सब योगियों में श्रेष्ठ हैं ||9||
| वर्त (देव समूह) के नायक को नमस्कार. गणपति को नमस्कार. प्रथमपति (शिवजी के गणों के अधिनायक) के लिए नमस्कार. लंबोदर को , एकदंत को, शिवजी के पुत्र को तथा श्रीवरदमूर्ति को नमस्कार – नमस्कार ||10||
| यह अर्थवशीर्ष (अथर्ववेद का उपनिषद) हैं. इसका पाठ जो करता हैं, ब्रह्म को प्राप्त करने का अधिकारी हो जाता हैं. सब प्रकार के विध्न उसके लिए बाधक नहीं होते. वह सब जगह सुख पाता हैं. वह पांचों प्रकार के महान पातकों तथा उपपातको से मुक्त हो जाता हैं ||11||
| सायंकाल पाठ करने वाला दिन के पापों का नाश करता हैं. प्रातःकाल पाठ करने वाला रात्रि के पापों का नाश करता हैं. जो प्रातः – सायं दोनों समय इस पाठ का प्रयोग करता है वह निष्पाप हो जाता हैं. वह सर्वत्र विध्नों का नाश करता हैं. धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करता हैं ||12||
| इस अर्थवशीर्ष को जो शिष्य न हो उसे नहीं देना चाहिए. जो मोह के कारण देता हैं वह पातकी हो जाता हैं. सहस्त्र (हजार) बार पाठ करने से जिन – जिन कामों – कामनाओं का उच्चारण करता हैं, उनकी सिद्धि इसके द्वारा ही मनुष्य कर सकता हैं ||13||
| इसके द्वारा जो गणपति को स्नान कराता है, वह वक्ता बन जाता हैं. जो चतुर्थी तिथि को उपवास करके जपता है वह विद्यावान हो जाता हैं, यह अर्थव वाक्य है जो इस मंत्र के द्वारा तपश्चरण करना जानता है वह कदापि भय को प्राप्त नहीं होता ||14||
| जो दूंर्वाकुर के द्वारा भगवान गणपति का यजन करता हैं वह कुबेर के समान हो जाता है. जो लाजो (धानी – लाई) के द्वारा यजन करता हैं वह यशस्वी होता हैं, मेधावी होता हैं. जो सहस्त्र (हजार) लड्डुओं (मोदको) द्वारा यजन करता हैं वह वांछित फल को प्राप्त करता हैं. जो घृत के सहित समिधा से यजन करता हैं, वह सब कुछ प्राप्त करता है ||15||
| आठ ब्राह्मणों को सम्यक रीति से ग्राह कराने पर सूर्य के समान तेजस्वी होता हैं. सूर्य ग्रहण में महानदी में या प्रतिमा के समीप जपने से मंत्र सिद्धि होती हैं. वह महाविध्न से मुक्त हो जाता हैं. जो इस प्रकार जानता है, वह सर्वज्ञ हो जाता है, वह सर्वज्ञ हो जाता हैं ||16||
अस्वीकरण (Disclaimer) : यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना ज़रूरी है कि madhuramhindi.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता हैं.


