Pitra Paksha | हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का विशेष महत्व है और पितृ पक्ष के समय पितरों के लिए तर्पण और पिंडदान किया जाता है जिससे कि पितरों की आत्मा को शांति मिलें और उनकी गति हो सकें. पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध के लिए देश में कई शहरों है जैसे कि हरिद्वार, गंगासागर, कुरुक्षेत्र, चित्रकूट और पुष्कर लेकिन बिहार में स्थित गया शहर का बहुत ही विशेष महत्व हैं. धार्मिक मान्यता है कि जो भी व्यक्ति एक बार गया में अपने पितरों का पिंडदान करता है तो उसे कभी पितृ पक्ष के समय श्राद्ध या पिंडदान की आवश्यकता नहीं पड़ती हैं तो वहीं यह भी मान्यता है कि गया में सर्वपितृ अमावस्या के दिन पिंडदान करने से 108 कुल और 7 पीढ़ियों का उद्धार होता है और पितरों की आत्मा को शांति मिलने के साथ ही उनको मोक्ष की भी प्राप्ति होती है यही कारण है कि देश और विदेशों से बिहार के गया धाम में श्रद्धालु पहुंचकर अपने पितरों के लिए पिंडदान किया करते हैं.
क्यों पितरों की मुक्ति के लिए गया में ही पिंडदान किया जाता है :
धार्मिक ग्रंथ गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण और वायु पुराण में गया शहर को पितृ कर्मों के लिए सर्वश्रेष्ठ तीर्थ स्थान माना गया हैं क्योंकि यह शहर विष्णु की नगरी कहलाती हैं. गरुड़ पुराण के अनुसार गया जाने के लिए घर से निकला एक-एक कदम पितरों को स्वर्ग की ओर पहुंचने की सीढ़ी बनती हैं तो वहीं विष्णु पुराण के अनुसार गया में पितरों का पूर्ण श्रद्धा से उनका श्राद्ध करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होने के साथ ही उन्हें जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिलती है यही कारण है कि गया को मोक्ष स्थली कहा जाता है. गया में श्राद्ध कर्म, तर्पण और पिंडदान करने के बाद कुछ भी शेष नहीं रहता हैं क्योंकि गया में भगवान विष्णु स्वयं पितृ देवता के स्वरूप में विराजमान रहने से इसे पितृ तीर्थ भी कहा जाता है तो वहीं गरुड़ पुराण में बताया गया है कि अगर 21 पीढ़ियों में किसी भी एक व्यक्ति के पांव फल्गु में पड़ जाए तो उसके सम्पूर्ण कुल का उद्वार हो जाती हैं. गया के फल्गु नदी का तट वही तट है जहां पर भगवान राम और सीता माता ने राजा दशरथ की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए श्राद्ध कर्म और पिंडदान किया था और महाभारत के समय पांडवों ने भी फल्गु नदी पर श्राद्ध कर्म किया था. हिंदुओं के साथ-साथ बौद्ध धर्म के लिए भी गया शहर बहुत पवित्र माना जाता है क्योंकि बोधगया को भगवान बुद्ध की भूमि कही जाती हैं.
जानते हैं गया तीर्थ से जुड़ी पौराणिक कथा :
मान्यता है कि भस्मासुर के वंशज गयासुर की देह पर गया शहर बसा हुआ है. पौराणिक कथा के अनुसार गयासुर असुर ने कठोर तप करके ब्रह्मा जी को प्रसन्न करके उनसे वरदान मांगा कि उसका शरीर पवित्र हो जाएं और उसके दर्शन मात्र से ही व्यक्ति पापों से मुक्त हो जाएं. इस वरदान के बाद लोगों में पाप से मिलने वाले दंड का भय समाप्त हो गया जिसके फलस्वरूप व्यक्ति अधिक पाप करने लगा और इन पापों से मुक्त होने के लिए वह गयासुर का दर्शन करते और पाप से मुक्त हो जाते. ऐसा होने से स्वर्ग और नरक का संतुलन बिगड़ने लगा क्योंकि बड़े से बड़े पापी भी स्वर्ग जाने लगे.
इस समस्या के समाधान के लिए देवताओं ने गयासुर से यज्ञ के लिए पवित्र भूमि दान करने को कहा. गयासुर से अपना ही शरीर ही देवताओं को दान किया और दान करते हुए उसने देवताओं से वरदान मांगा कि दान किया हुआ स्थान भी पापों से मुक्ति और शांति के लिए जाना जाएं. जब गयासुर लेता तो उसका शरीर पांच कोस में फैल गया और यही पांच कोस आगे चलकर गया शहर बना और इसी गयासुर के पुण्य प्रभाव से गया पितृ तीर्थ के रूप में जाना जाता हैं.
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FAQ – सामान्य प्रश्न
गया शहर किस असुर के शरीर पर बसा हुआ है ?
गयासुर असुर.
भगवान श्रीराम और सीता माता ने राजा दशरथ के श्राद्ध कर्म किस नदी के तट पर किया था ?
गया के फल्गु नदी के तट पर.
किस शहर को मोक्ष स्थली कहा जाता है ?
गया शहर.
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