Parma Ekadashi Vrat Katha | हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का बहुत विशेष महत्व होता है. साल में कुल 24 एकादशियां होती हैं लेकिन तीन साल में अधिकमास लगने से 26 एकादशियां होती हैं. सभी एकादशी के अलग – अलग नाम होने के साथ इनके महत्व भी अलग – अलग होते है और यह सभी एकादशियां भगवान विष्णु की पूजा के लिए समर्पित होता हैं. परमा एकादशी का व्रत तीन साल में अधिकमास के दौरान रखा जाता हैं और अधिकमास की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को परमा एकादशी का व्रत रखा जाता है. परम एकादशी के दिन व्रत रखने के साथ ही व्रत कथा को पढ़ना या फिर सुनना बहुत महत्वपूर्ण होता हैं और बिना कथा को पढ़े या सुनें एकादशी व्रत पूर्ण नहीं होने से व्रत के पुण्य फलों की प्राप्ति नहीं होती है.
परमा एकादशी व्रत कथा :
प्राचीन काल में कांपिल्य नगरी में एक ब्राह्मण सुमेधा अपनी पत्नी के साथ रहता था. सुमेधा ब्राह्मण बहुत धर्मात्मा था तो वहीं उसकी पत्नी भी पवित्र और पतिव्रता थी लेकिन पूर्व में किए किसी पाप के कारण से यह दंपति अपना जीवन बहुत ही गरीबी में बीता रहे थे यहां तक कि कभी – कभी तो ब्राह्मण को भिक्षा नहीं मिलने से दोनों पति – पत्नी भूखे पेट ही सोना पड़ता था इस तरह से दंपति बहुत ही घोर दरिद्रता से जीवन को व्यतीत कर रहे थे. अपनी इस स्थिति को देखते हुए ब्राह्मण सुमेधा ने एक दिन अपनी पत्नी से कहा – ” हे प्रिय ! जब मैं धनवानों से धन मांगता हूं तो वे मना कर देते हैं और धन के बिना गृहस्थी चल नहीं सकती इसलिए अगर तुम्हारी सहमति हो तो मैं परदेश जाकर धन अर्जित करूं. ” अपने पति की इस तरह की बातों को सुनकर ब्राह्मण की पत्नी ने कहा – ” हे! स्वामी अगर कोई दान नहीं करता तो परमात्मा ही उसे अन्न प्रदान करते हैं, इसलिए आप इसी स्थान पर रहें, वैसे भी मैं आपका विछोह नहीं सह सकती हूं क्योंकि पति के बिना स्त्री की माता, पिता, भाई, ससुर और बाकी सभी संगे – संबंधी उसकी निंदा करते हैं, इसलिए स्वामी कृपा करके आप कहीं ओर नहीं जाएं, जो भाग्य में होगा वो हमें यहीं प्राप्त हो जाएगा. ” ब्राह्मण सुमेधा अपनी पत्नी की बात को मानकर परदेश नहीं जाकर वहीं रुक गया और फिर इसी तरह ब्राह्मण दंपति अपना जीवन गरीबी में बिताने लगा.
कुछ समय बाद वहां कौंडिण्य ऋषि आएं, ऋषि कौंडिण्य को देखकर ब्राह्मण दंपति ने उनको प्रणाम करके बोले – आज आपके दर्शन से हम धन्य हो गया और हमारा जीवन सफल हुआ और फिर ऋषि को दंपति ने आसन देकर भोजन का प्रबंध किया. भोजन कराने के बाद ब्राह्मण की पत्नी ने ऋषि से कहा ” हे ऋषिवर ! आप कृपा करके हमें दरिद्रता को दूर करने की कोई विधि और उपाय को बताएं, मैने अपने पति को परदेश जाकर धन कमाने से रोका है, मेरे भाग्य से आप यहां आएं क्योंकि मुझे पूरा भरोसा है कि अब जल्द ही हमारी दरिद्रता समाप्त हो जाएगी.” ऋषि पत्नी की बात को सुनकर ऋषि कौंडिण्य बोले – अधिकमास की कृष्ण पक्ष की परम एकादशी के व्रत से सभी तरह के पाप, दुःख और दरिद्रता आदि का नाश हो जाता है. परमा एकादशी व्रत को विधिवत् करने से मनुष्य धनवान हो जाता हैं क्योंकि यह एकादशी धन – वैभव प्रदान करने वाली और पापों का नाश करने वाली है. मान्यता है कि धनाधिपति कुबेर ने भी इस परम एकादशी का व्रत विधि विधान से किया था जिसके फलस्वरूप भगवान शिव प्रसन्न होकर उनको धनाध्यक्ष का पद दिया, केवल इतना ही नहीं इसी व्रत के पुण्य फल से सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र को पुत्र, स्त्री और राज्य की प्राप्ति हुई थी.
ब्राह्मण दंपति को कौंडिण्य ऋषि ने परम एकादशी व्रत का विधान को बताते हुए कहा – परमा एकादशी के दिन सुबह स्नानादि करके निवृत्त होकर पंचरात्रि व्रत आरंभ करना चाहिए जो पांच दिन तक निर्जला व्रत करता है, वे अपने माता – पिता और स्त्री सहित स्वर्ग लोक को जाता हैं, जो केवल पांच दिन तक संध्या भोजन करता हैं वे स्वर्ग को जाते हैं, जो स्नान करके पांच दिन तक ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं वह समस्त संसार को भोजन कराने जैसा पुण्य मिलता हैं, जो इस व्रत में अश्व दान करता हैं उनको तीनों लोकों को दान करने का फल मिलता हैं, जो ब्राह्मण को तिल दान करते हैं उसको तिल की संख्या के बराबर वर्षों तक विष्णुलोक में वास करता हैं, जो मनुष्य घी का पात्र दान करता हैं वह सूर्यलोक को जाता हैं, जो पांच दिन तक ब्रह्मचर्यपूर्वक रहता है वह देवागणनाओं के साथ स्वर्ग को जाता हैं. तुम भी अपने पति के साथ इस व्रत को विधि विधान से करो इससे तुम्हे अवश्य ही जीवन में सिद्धि और मरणोपरांत स्वर्ग की प्राप्ति होगी.
ब्राह्मण सुमेधा अपनी पत्नी ने ऋषि कौंडिण्य के कहेनुसार अधिकमास की परमा एकादशी का पांच दिन तक व्रत किया और व्रत के पुण्य से ब्राह्मण की पत्नी ने अपने घर पर एक राजकुमार को आते हुए देखा जो ब्रह्माजी की प्रेरणा से उसे सभी वस्तुओं से परिपूर्ण एक उत्तम घर देने के साथ ही आजीविका के लिए एक गांव भी दिया, इस तरह से ब्राह्मण दंपति की दरिद्रता दूर हो गई और वे धरती पर सुख भोगने के बाद उन्हें श्रीहरि विष्णु के लोक में स्थान प्राप्त हुआ.
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FAQ – सामान्य प्रश्न
1) परमा एकादशी किस माह में आता है ?
अधिकमास,
2) परमा एकादशी कब मनाया जाता है ?
अधिकमास की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि.
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