Bhagavad Gita | आखिर क्यों हमेशा अच्छे लोगों के साथ बुरा होता हैं ? श्रीकृष्ण ने भागवत गीता में दिया इसका जवाब..

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Bhagavad Gita | अक्सर हमारे मन में ये सवाल आता है कि जो लोग अच्छा काम करते है सबके लिये अच्छा सोचते है, वो ही जीवन मे सबसे ज़्यादा परेशानी का सामना करते है. वही जो लोग बुरा काम करते हैं हर किसी का बुरा ही सोचा करते है वो अपना जीवन खुशी और चैन से जीते है. धर्म और सत्य की राह पर चलने वाले को आखिर क्यों देनी पड़ती हैं बहुत सारी परीक्षा लेकिन जो अधर्म के रास्ते पर चलते है वो हमेशा खुश रहते है और जीवन का सुख उठाते है. इस प्रकार की दुविधा हमारे मन मे कभी ना कभी आया करती है तो इन सभी सवाल के जवाब को जानेंगे जो भागवत गीता में बताया गया है जिसे श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया.

भागवत गीता में लिखित कथा के अनुसार जब भी अर्जुन के मन मे किसी तरह की कोई उलझन पैदा होती तो उलझन को दूर करने के लिए श्रीकृष्ण के पास चले जाते थे. एक बार अर्जुन के मन में एक दुविधा उत्पन्न हुई और वह श्रीकृष्ण के पास जाकर अपनी दुविधा बताई की अच्छे लोग के साथ हमेशा बुरा क्यों होता है? वहीं बुरे लोग खुशहाली से जीवन को बीताते है. अर्जुन की इस दुविधा को सुनकर श्रीकृष्ण मुस्कुराएं और बोला “मनुष्य जैसा सोचता है और महसूस करता है जबकि ऐसा कुछ नहीं होता है बल्कि अज्ञानता के कारण से वो सच्चाई को समझ नहीं पाते है. अर्जुन उनकी इस बात को समझ नहीं सके कि आखिर श्रीकृष्ण बताने क्या चाह रहे हैं, इसके बाद श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाते हुए कहा – हे अर्जुन! मैं तुम्हें एक कथा सुनाता हूँ उसे सुनकर तुम समझ जाओगें कि हर मनुष्य को उसके कर्म के हिसाब से ही फल की प्राप्ति होती हैं. प्रकृति हर किसी को अपना रास्ता चुनने का मौका देती है अब वो मनुष्य की इच्छा पर निर्भर करता है कि उसे धर्म की राह चुननी हैं या फिर अधर्म की. कथा को आगे सुनाते हुए श्रीकृष्ण ने कहा – एक नगर में दो पुरूष रहते थे, पहला पुरूष व्यापारी था जो अपने जीवन में धर्म को बहुत महत्त्व देता था, वह पूजा पाठ में विश्वास रखता था हर रोज भगवान की पूजा किया करता था इसके साथ दान धर्म भी करता था.

वही दूसरा पुरूष बिल्कुल उसके विपरीत था वह हर दिन मंदिर तो जाता था लेकिन पूजा करने को नही बल्कि मंदिर के बाहर रखे जूते चप्पल को चुराने, उसे दान धर्म से कोई मतलब नहीं रहता. समय गुजरता गया और एक दिन बहुत तेज बारिश हो रही थी जिसके कारण मंदिर में पुजारी के अलावा कोई नहीं था. यह बात जब दूसरे पुरूष को पता चला तो उसने मंदिर में चोरी करने की सोचा और उसने यही किया पुजारी की नज़र से खुद को बचाकर उसने मंदिर का सारा धन चुरा लिया, तभी उसी समय धर्म कर्म में विश्वास रखने वाला पुरूष भी मंदिर पहुंचा. किन्तु दुर्भाग्य से मंदिर के पुजारी ने उस भले व्यक्ति को ही चोर समझ कर शोर मचाने लगा, शोर सुनकर वहां लोग इकट्ठा हो गए और उन सब ने उस भले व्यक्ति को बहुत मारा. किसी तरह वो खुद की बचाते वहां से निकला तो दुर्भाग्य ने उसका साथ ना छोड़ा, मंदिर के बाहर वो एक गाड़ी से टकराकर घायल हो गया फिर वो व्यक्ति लगड़ाते हुए घर जाने लगा तो रास्ते में उसकी मुलाकात उस व्यक्ति से हुआ जिसने मंदिर से धन को चुराया था उसने कहा – आज तो मेरी भाग्य चमक गई जिससे मुझे एक साथ इतना सारा धन मिल गया. ये सब सुनकर और देखकर उस पहले व्यक्ति को बहुत दुःख हुआ और घर आकर भगवान की सभी फ़ोटो को निकाल कर फेंक दिया.

कुछ सालों के बाद दोंनो व्यक्ति की मृत्यु हो गई. मरने के बाद दोनों व्यक्ति को यमराज के पास ले जाया गया वहां जब भले व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति को देखा तो उसे बहुत गुस्सा आया और वो क्रोधित होकर यमराज से पुछा – मैंने हमेशा अच्छे कर्म किया, दान में विश्वास रखता था उसके बदले मुझे जीवन भर अपमान और दर्द ही मिला और इस व्यक्ति ने हमेशा बुरे कर्म किये फिर भी इसे धन की पोटली, आखिर ऐसा भेदभाव क्यों? इस पर यमराज ने कहा – पुत्र तुम गलत समझ रहे हो जिस दिन तुम गाड़ी से टक्कर हुई वो दिन तुम्हारी जीवन का अंतिम दिन था लेकिन तुम्हारे  अच्छे कर्मो के वजह से तुम्हारी मौत सिर्फ एक छोटी चोट में बदल गई और तुम इस दुष्ट व्यक्ति के बारे में जानना चाहते हो तो सुनो दरअसल इसके भाग्य में राजयोग था मगर इसके कुर्कुर्मो और अधर्म की वजह से वो सिर्फ एक छोटी सी धन की पोटली में बदल गया.

कथा सुनाने के बाद श्रीकृष्ण अर्जुन से बोले – अर्जुन तुम्हें तुम्हारे सवाल का जवाब मिल ही गया होगा कि भगवान हमें कब क्या किस रूप में दे रहे हैं ये मनुष्य को समझ में नहीं आता हैं. अगर आप अच्छे कर्म करते रहें तो भगवान की कृपा हमेशा बनी रहती हैं तो अपने अच्छे कर्मों को बदलना नहीं चाहिए क्योंकि उसका फल हमें इसी जीवन में मिलता हैं इसलिए मनुष्य का फर्ज है कि वो  हमेशा अच्छे कर्म करते रहे क्योकि श्रीकृष्ण ने गीता में बताया है कि किसी के द्वारा किया गया कर्म बेकार नहीं जाता हैं चाहे वो अच्छा हो या बुरा और ऐसा सोचना की भगवान हमारे कर्मों को नजरअंदाज कर रहे है,ये बिल्कुल भी सत्य नहीं है. 


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