Pitra Stotra | पितृ स्तोत्र मार्कण्डेय पुराण में वर्णित हैं और इसका पाठ पूर्वजों के लिए किया जाता है. धार्मिक मान्यता हैं कि अगर किसी को पितृ दोष से मुक्ति पाना है तो उसे पितृ पक्ष में या किसी भी माह की चतुर्दशी तिथि या फिर अमावस्या को इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए. जिस घर में पितृ स्तोत्र को लिखकर रखा जाए तो उस घर में पितृ पक्ष में स्वयं पितृ वास करते हैं तो वहीं ऐसी मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इसका श्राद्ध पक्ष में या फिर नियमित रूप से पाठ करता है उसको पितरों की विशेष कृपा मिलने के साथ ही जीवन में सुख – समृद्धि का आगमन होने के अलावा उसे नौकरी या व्यापार में उन्नति भी मिलती हैं.
Pitra Stotra – पितृ स्तोत्र
|| पितृ स्तोत्र का संस्कृत और हिंदी अनुवाद ||
| अर्चितानाममूर्तनमां पितृणाम दीप्ततेजासम् |
नमस्यामि सदा तेषा ध्यानिनाम् दिव्यचक्षुषाम ||
अर्थ : जो सबके द्वारा पूजा किये जाने योग्य, अमूर्त, अत्यन्त तेजस्वी, ध्यानी और दिव्यदृष्टि से सम्पन्न है. उन पितरों कोे मैं सदा प्रणाम करता हूं.
| इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तस्था |
सप्तर्षिणाम तथान्येषा तान् नमस्यामि कामदान् ||
अर्थ : जो इंद्र आदि समस्त देवताओं, दक्ष, मारीच, सप्तर्षियों तथा दूसरों के भी नेता है, हर मनोकामना को पूर्ण करने वाले उन पितरों को मैं प्रणाम करता हूं.
| मन्वादीनां च नितार: सूर्याचन्दमसोस्तथा |
तान् नमस्यामहं सर्वान् पितृनप्युदधावपि ||
अर्थ : जो मनु आदि राजर्षियों, मुनिश्वरों तथा सूर्य देव तथा चंद्र देव के भी नायक हैं. उन समस्त पितरों को मैं जल और समुद्र में भी प्रणाम करता हूं.
| नक्षत्राणाम ग्रहाणाम च व्यवग्न्योरणभसस्तथा |
द्यावापृथिविव्योश्च तथा नमस्यामि कृतांजलि ||
अर्थ : नक्षत्रों, ग्रहों, अग्नि, वायु, आकाश ओर द्युलोक तथा पृथ्वी के भी जो नेता हैं, उन पितरों को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूं. उनका आशीर्वाद सदैव मुझ पर बना रहे.
| देवर्षिणाम जनितृणश्च सर्वलोकनमस्कृतान |
अक्षय्यस्य सदा दात्रुन नमस्येहम कृतांजलि ||
अर्थ : जो देवर्षियों के जन्मदाता, समस्त लोकों द्वारा वन्दित और सदा अक्षय फल को देने वाले हैं, उन पितरों को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूं.
| प्रजापति कश्पाय सोमाय वरुणाय च |
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृतांजलिः ||
अर्थ : प्रजापति, सोम, कश्यप, वरुण और योगेश्वरों के रूप में स्थित पितरों को सदा हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूं.
| नमो गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु |
स्वयंभुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे ||
अर्थ : सातों लोकों में स्थित सात पितृगणों को प्रणाम है।. मैं योगदृष्टि संपन्न स्वयंभू जगतपिता ब्रह्माजी को प्रणाम करता हूं. आपका आशीर्वाद सदा मुझ पर बना रहे.
| सोमादराणाम् पितृगणम् योगमूर्तिधरणस्तथा |
नमस्यामि तथा सोमम् पितरम् जगतामहाम् ||
अर्थ : चन्द्र देव के आधार पर प्रतिष्ठित और योगमूर्तिधारी पितृगणों को मै प्रणाम करता हूं, साथ ही सम्पूर्ण जगत् के पिता सोम को नमस्कार करता हूं. उनका आशीर्वाद सदा मुझ पर बना रहे.
| अग्रिरूपांस्तथैवान्यान नमस्यामि पितृणहम |
अग्रिषोममयम विश्वम यत एतदशेषत: ||
अर्थ : अग्निस्वरूप अन्य पितरों को मैं प्रणाम करता हूं क्योंकि श्री पितर जी यह सम्पूर्ण जगत् अग्नि और सोममय है, उनका आशीर्वाद सदा बना रहे.
| ये तु तेजसी ये चैतय सोमसूर्याग्रिमूर्तया, जगत्स्वरुपिनश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिण: |
नमो नमो नमस्तेस्तु प्रसीदन्तु स्वधाभुज ||
अर्थ : जो पितर तेज में स्थित है, जो ये चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं तथा जो जगत्स्वरूप एवं ब्रह्मस्वरूप है, उन सम्पूर्ण योगी पितरों को मैं एकाग्रचित होकर बारम्बार प्रणाम करता हूं. वे स्वधाभोजी पितर मुझ पर प्रसन्न हो उनका आशीर्वाद सदा मुझ पर बना रहे.
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FAQ – सामान्य प्रश्न
पितृ स्तोत्र को किस पुराण में वर्णित किया गया हैं ?
मार्कण्डेय पुराण.
पितृ स्तोत्र को किस दिन पाठ करना चाहिए ?
पितृ पक्ष, किसी माह की चतुर्दशी या फिर अमावस्या.
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